जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बन्दउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्व।
बन्दउँ किन्नर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब।।
।श्रीरामचरितमानस।
संसार में जड़ और चेतन जितने भी जीव हैं, उन सभी को राममय जानकर उनके चरणकमलों की मैं सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ।देवता, दैत्य,मनुष्य, नाग,पक्षी, प्रेत,पितर, गन्धर्व,किन्नर और निशाचर आदि सभी को मैं प्रणाम करता हूँ।अब आप सब मुझ पर कृपा करें।
।।जय सियाराम जय जय सियाराम।।
भावार्थः---
महारामायण और श्रीमद्भागवत में भी सभी जीवों की वन्दना की गयी है।यथा,,,
भूमौ जले नभसि देवनरासुरेषु भूतेषु देवि सकलेषु चराचरेषु।
पश्यन्ति शुद्ध मनसा खलु रामरूपम् रामस्य ते भुवितले समुपासकाश्च।।
(महारामायण)
अर्थात हे देवी,जो लोग पृथ्वी, जल,आकाश,देवता, मनुष्य, असुर ,चर अचर सभी जीवों में शुद्ध मन से प्रभुश्री राम का ही रूप देखते हैं, पृथ्वी पर वे ही श्रीराम के उत्तम उपासक हैं।
इसी से मिलता जुलता एक श्लोक श्रीमद्भागवत में भी है।यथा,,,
खं वायुमग्निम् सलिलं महीञ्च ज्योतीम्पिसत्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित् समुद्रानश्च हरे:शरीरं यत्किंचितभूतम् प्रणमेदनन्यः।।
अर्थात आकाश,वायु,अग्नि, जल,पृथ्वी, नक्षत्र, प्राणी,दिशाएं,वृक्ष आदि सभी नदियाँ और समुद्र जो कुछ भी है, वह सब भगवान का शरीर ही है।अतः सबको अनन्य भाव से प्रणाम करो।
।।जय राधा माधव जय कुञ्जबिहारी।।
।।जय गोपीजनबल्लभ जय गिरिवरधारी।।
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