प्रखर दीक्षित
फर्रुखाबाद
जयति शारदे
मातु जू शारद करहु कृपा, अघ मेटहु दूषण तमस ढ़िठाई।
मुद मंगल आंतर छाँव रहा।, परसै बरसै माँ प्रभुताई।।
ज्ञान को करि आलोक हुए, पढ़ि पावौं प्रेम को आखर ढ़ाई।
आलस नींद प्रमाद हरौ, उजियार करौ देहु नेह मिताई।।
श्वेतासन हंस वाहिनी माँ, वीणपाणि शुभदा माई।
उछाह उमंग तरंग जिया, सरजन मँह रखियो शुचिताई।।
देहु भगति विमल साधना प्रखर , रितम्भरा जग महामायी।
नाशहु संताप हरहु संशय जग जननी उपजायी।।
सुपंथ गहैं शुभ काज सरैं, सोई नीति गुना जो वेद बताई।
आरूढ़ मराल को आसन ह्वै, आ दीजो ज्ञान प्रचुर माई।।
विभक्ति विभेद न द्रोह रहाय, कांखौं आखर शुभ फलदायी।
सुकंठ सुवर्ण लालित्य रम्य, शपणागत प्रखर शीश नायी।।
अज्ञान तमस की गहन कोर, आच्छादित बदरी संशय की।
देहु शब्द यथा अरु भाव गहन, वल्गाऐं थामौ प्रश्रय की।।
अर्थन को सकल निरुपण शुचि रुचि भाव व्यञ्जना आशय की।
रस राग रंग छांदस यति युति बल बुद्धि प्रबल मति निश्चय की ।।
*प्रखर दीक्षित*
*फर्रुखाबाद*
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