यह नींव बनाई है जिन्होंने,
करके जीवन कुर्बान अपना।
खुशहाली में ही रहें अपनें,
देखे होंगे यही उन्होंने सपना।।
सोंचा भी नहीं होगा यह वे,
जिसके लिए किया हूँ अर्पण।
हस्र उसका ऐसा भी होगा,
बन न सकूँगा उसी का दर्पण।।
उतावले होंगे पा अधिकार,
समझेंगे न अर्थ आजादी का।
ब्याख्यायें वह मन की कर,
खोदने लगेंगे गढ्ढे बर्बादी का।।
ज्ञानी 'पथिक' भी स्वार्थ में,
समझ न पाये वे मतलब को।
स्वतंत्रता प्रतिबन्ध होती है,
भूल गया वह उस तलब को।।
सीमाओं में है निखरते रुप,
होते कुरुप जब तोड़ चलते।
अक्ल ठीकानें लगते सभी,
नशीहतें जैसे वे छोड़ चलते।।
मंथन करें आओ मिलकर,
यह वही है क्या ? आजादी।
जिसको मनाते हैं हम सब,
होके निरंकुश यह आजादी।।
अशोक कुमार मिश्र
सुगम पार्क, आसनसोल
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