डा0 हरिनाथ मिश्र

 *षष्टम चरण*(श्रीरामचरितबखान)-62

तपस-बेष अरु दूबर गाता।

नेम व धरम सहित मम भ्राता।।

      सुमिरत पल मोंहि कल्प समाना।

       केहि बिधि तुरत ताहिं पहँ जाना।

करहु राज तुम्ह एक कल्प भर।

सुमिरन करत मोंहि निज उर धर।।

      सुनत बचन प्रभु छुइ के चरना।

       गए बिभीषन पुनि निज भवना।।

भरि क बिमान प्रचुर मनि-बसना।

आए तुरत गहे प्रभु-चरना ।।

       सुनहु बिभीषन कह रघुराई।

        जावहु गगन बिमान उड़ाई।।

फेंकहु महि पे सभ पट-भूषन।

लैहैं तिनहिं सभें निज रुचि मन।।

      मुहँ-मुहँ पकरि तजहिं कपि-भालू।

       बिहँसहिं लखि सिय-राम कृपालू।।

तुम्हरे बल मैं रावन मारा।

राज बिभीषन-तिलक सँवारा।।

     कह प्रभु राम सुनहु कपि-भालू।

      जाहु गृहहिं निज होइ निहालू।।

निर्भय रहहु मोहिं उर धइ के।

कानन-बन-संपति लइ-लइ के।।

      सुनि अस बचन राखि हिय रामा।

      गए तुरत सभ निज-निज धामा।।

दोहा-कहि नहिं सके कछुक तहाँ,अंगद-नील-कपीस।

         नल-हनुमान-बिभीषनै,देखि कोसलाधीस ।।

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