"काव्य रंगोली परिवार से देश-विदेश के कलमकार जुड़े हुए हैं जो अपनी स्वयं की लिखी हुई रचनाओं में कविता/कहानी/दोहा/छन्द आदि को व्हाट्स ऐप और अन्य सोशल साइट्स के माध्यम से प्रकाशन हेतु प्रेषित करते हैं। उन कलमकारों के द्वारा भेजी गयी रचनाएं काव्य रंगोली के पोर्टल/वेब पेज पर प्रकाशित की जाती हैं उससे सम्बन्धित किसी भी प्रकार का कोई विवाद होता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उस कलमकार की होगी। जिससे काव्य रंगोली परिवार/एडमिन का किसी भी प्रकार से कोई लेना-देना नहीं है न कभी होगा।" सादर धन्यवाद।
आशुकवि रमेश कुमार द्विवेदी चंचल
पावनमंच को प्रणाम ,आज का विषय ...धूम्रपान ,रचनाओं का अवलोकन करें.... पान तौ नीकु लगै कतना वतना हमते नहि लिखि पढि़ जाई।। पान चढा़ देवी देव सदा नित होय नही बिनु याके पुजाई।। पान बतावतु है मुखभूषन शोभा कहाँ बिनु या पहुनाई।। भाखत चंचल नाशु भयो जबु आय मिली यहु धूम्र बुराई।। 1।। पान विभूषित है रंगरूप जो आदरू औ सम्मान बढा़वै।। आवैं जौ द्वारे कोऊ मेहमानु तौ स्वागतु मा जलपानहिं धावै।। मुल आवै शुरूर जबै मनमा जबु पान संगै मदपानहिं आवै।। भाखत चंचल होवै बहूत जौ नाली गिरैं अरू शीश झुकावैं।।2।। पूत औ पतनी दुआरे लखैं अरू स्वामी खडे़ मधुशाला रखावैं ।। खाता जौ बैंकु कय खाली परै तौ खेते मकान कय नम्बर लावैं ।। कछू दिनु पीवै मधुपमहारानी बादि मँहय वै वनका पी जावैं ।। भाखत चंचल काव कही बिनु भोजनु नारि अपर घर धावैं ।।3।। आशुकवि रमेश कुमार द्विवेदी, चंचल।ओमनगर
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