निशा अतुल्य,

प्रेम और स्पर्श

किसने जाना
जीवन समर्पण
अंधे है सभी।

वो लालसाएं
मुखरित भटके
जीवन खत्म ।

समझा कौन
प्रेम और स्पर्श हो
स्वार्थ रहित ।

माँ समर्पित
निस्वार्थ करे कर्म
संतुष्ट रहे ।

अंत समय
कठिन है जीवन 
बुरा बुढापा ।

पाला सबको
अशक्त जन्मदाता
घर बाहर ।

सम्मान करो
सदा जन्मदाता का
मन के भाव ।

आशीष मिलें
सफल हो जीवन
विश्वास रख ।

स्वरचित
निशा"अतुल्य"

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